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A CRPF JAWAN POURS HIS HEART OUT IN THIS INTERVIEW


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नरक में मोहलत (कहानी)

  -प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच्ची को गोद से उतार, पत्नी के गाल थपथपाता हुआ वह दरवाजे से निकल पड़ा ऑफिस के लिए। इरादा बिल्कुल वही था जैसा उसने अनिता से कहा था। लेकिन अपने मिजाज का क्या करे। एक बार जब दिमाग भन्ना जाता है तो कुछ आगा-पीछा सोचने के काबिल कहां रहने देता है उसे।  मामला दरअसल वेतन वृद्धि का था। अखबार का मुंबई संस्करण शुरू करते हुए सीएमडी साहब ने, जो इस ग्रुप के म...

"बोले तो पकौड़े बेचने के फैसले ने मेरी ज़िन्दगी बदल डाली!"

संपादक का फरमान था, एक पकौड़े बेचने वाले का इंटरव्यू करना था। सो मैं सड़क के किनारे एक ठेले पर पहुंचा। ठेले पर बोर्ड लगा था, "राम भरोसे रेस्तरां"। अच्छी-खासी भीड़ थी इसलिए ठेले के मालिक को बात करने के लिए मनाने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी। पेश है साक्षात्कार के कुछ महत्वूर्ण अंश:  "आप कब से पकौड़े बेचते हैं?" "जी, 16 मई 2014 से।" "उससे पहले क्या करते थे?" "बेरोजगार ही था।" "फिर अचानक पकौड़े तलने का खयाल कैसे आया?" "15 मई की रात एक महापुरुष सपने में आये और उन्होंने कहा 'बालक, तेरे दुःख भरे दिन बीत गये और अच्छे दिन आ गए है। कल से तू नौकरी के लिए दर-दर भटकना बंद कर दे, तुझे नौकरी मांगनी नहीं पगले नौकरी देनी है! तू कोई अपना काम शुरू कर!" "फिर...?" "फिर मैंने असमंजस में पूछा कि सर मैं क्या करूं? उन्होंने कहा चाय-पकौड़ी का ठेला लगा ले, दिन में 200 रुपये कहीं नहीं जायेंगे। बस फिर क्या था, यह दिव्य ज्ञान मिलने के बाद मैंने अगले दिन से ही यह 'राम भरोसे रेस्तरां' का बोर्ड लगाकर यह ठेला शुरू...

प्रेमचंद का साहित्य और सिनेमा

-गुलजार हुसैन प्रेमचंद का साहित्य और सिनेमा के विषय पर सोचते हुए मुझे वर्तमान फिल्म इंडस्ट्री के साहित्यिक रुझान और इससे जुड़ी उथल-पुथल को समझने की जरूरत अधिक महसूस होती है। यह किसी से छुपा नहीं है कि पूंजीवादी ताकतों का बहुत प्रभाव हिंदी सहित अन्य भाषाओं की फिल्मों पर है।...और मेरा तो यह मानना है की प्रेमचंदकालीन सिनेमा के दौर की तुलना में यह दौर अधिक भयावह है , लेकिन इसके बावजूद साहित्यिक कृतियों पर आधारित अच्छी फिल्में अब भी बन रही हैं।  साहित्यिक कृतियों पर हिंदी भाषा में या फिर इससे इतर अन्य भारतीय भाषाओं में अच्छी फिल्में बन रही हैं , यह एक अलग विषय है लेकिन इतना तो तय है गंभीर साहित्यिक लेखन के लिए अब भी फिल्मी राहों में उतने ही कांटे बिछे हैं , जितने प्रेमचंद युग में थे। हां , स्थितियां बदली हैं और इतनी तो बदल ही गई हैं कि नई पीढ़ी अब स्थितियों को बखूबी समझने का प्रयास कर सके। प्रेमचंद जो उन दिनों देख पा रहे थे वही ' सच ' अब नई पीढ़ी खुली आंखों से देख पा रही है। तो मेरा मानना है कि साहित्यिक कृतियों या साहित्यकारों के योगदान की उपेक्षा हिंदी सिनेम...