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एक लड़की को...' देखी तो ऐसा लगा...!

पढ़ने वालों के लिये चेतावनी: यह कोई टिपीकल फिल्म समीक्षा नहीं है पर अगर आप फिल्म देखना चाहते हैं तो आगे न पढ़ें। आपका मज़ा किरकिरा हो सकता है। यहां बस इस फिल्म को देखने के बाद पटकथा और प्रस्तुतिकरण के बारे में मन में आये कुछ उलटे-सीधे विचार यहां पेश करने की कोशिश की गई  है... फिल्म के विषय वस्तु के साथ समस्या नहीं है। दो लड़कियों के बीच प्रेम कहानी है, जो अनकन्वेंशनल होने के कारण दिलचस्प फिल्म हो सकती थी लेकिन प्रस्तुतिकरण इतना 'बॉलीवुडिश' है कि फिल्म उस तरह से दिल को छू नहीं पाती। हालांकि कथित मुख्यधारा की यानी बॉलीवुड फिल्मों में समलिंगी किरदार पहले भी आये हैं पर वह अधिकतर कैरीकैचर होते हैं और प्रमुख किरदार नहीं होते ऐसे में एक पूरी फिल्म के केंद्र में दो लड़कियों की प्रेम कहानी हो तो अपने आप में यह एक अनूठी या हटके बात हो जाती है। फिल्म का सकारात्मक पहलू विषय ही है जो संवेदनशील है और एलजीबीटी समुदाय को नकारात्मक नजरिये से पेश नहीं करता या उनका मज़ाक नहीं उड़ाता  पर जैसाकि ऊपर मैंने कहा है, समस्या पटकथा और प्रस्तुतिकरण के साथ है, जिससे यह बेहद साधा...