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Showing posts with the label Satire

चुनावपूर्व पुल दुर्घटनाएं कैसे कवर करें पत्रकार? डूज़ एंड डोंट्स

डिस्क्लेमर: यह लेख पाठ्यपुस्तकों में शामिल कराने के पवित्र उद्देश्य के साथ लिखा गया है। विषय चूंकि मीडिया से संबंधित है इसलिए अपेक्षा है कि इसे सरकारी, अर्ध सरकारी व निजी मीडिया संस्थानों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। कोई और समय होता तो यह लेख लिखने की आवश्यकता ही नहीं होती लेकिन समय ऐसा है कि मीडिया जगत से ‘देशद्रोहियों‘ को जेलों में ठूंसकर लाइन पर लाने का काम उतनी तेजी  से नहीं हो पा रहा है, जितनी तेजी से होना चाहिए था। खासकर सोशल मीडिया में तो इनका ही बोलबाला है सो कोई भी त्रासद दुर्घटना होने पर उसका कवरेज कैसे किया जा चाहिए, कैसे नहीं किया जाना चाहिए यानी ‘डूज़‘ क्या हैं, ‘डोंट्स‘ क्या हैं, यहां  बताया जा रहा है। आशा है कि मीडिया के छात्रों के लिए यह लेख उपयोगी साबित होगा।  डूज़  -पॉजिटिव बनें। संवेदनशील बनें।  -यह जरूर बताएं कि पुल कितने सौ वर्ष पुराना था? और पुल पर क्षमता से बहुत ज्यादा लोग थे।  -लोगों की लापरवाही या चूक, जैसे उन्होंने प्रशासन के निर्देशों/चेतावनियों का पालन नहीं किया और वह खुद ही दुर्घटना के लिए जिम्मेदार थे, को हाइलाईट कर...

फ्रॉम द मेकर्स ऑफ ब्लॉकबस्टर फ्रेंचाईजी ‘लॉकडाऊन‘ कम्स ‘जीना-मरना कोरोना संग‘

-कोरोना वायरस से बच गये पत्रकारों का इस वर्चुअल प्रेस कांफ्रेंस में स्वागत करते हुए बता दूं कि हमारी लॉकडाऊन फ्रेंचाइजी सफल रही है, क्या कहा? प्रमाण? अजी, आपका जीवित होना और इस पीसी में हिस्सा लेना ही इसका प्रमाण है, अब हम अनलॉक फ्रेंचाइजी ला रहे हैं। आपको जो पूछना है, पूछिए: -लॉकडाऊन शुरू करने से पहले कितने मामले थे? -एक्ज़ेक्ट फिगर तो मुझे याद नहीं, पर दो सौ से तीन सौ के बीच होंगे। -आज कितने हैं? -एक्ज़ेक्ट फिगर मुझे देखना पड़ेगा पर यही कोई दो लाख होंगे। मैं जानता हूं, आप बड़े बदमाश हैं। लॉकडाऊन को फ्लॉप साबित करना चाहते हैं पर याद रखिये, हम लॉकडाऊन नहीं लाते न, तो यह फिगर बीस लाख या उससे भी ज्यादा होता। -बीस लाख का अनुमान महामारी विशेषज्ञों से आया होगा? -नहीं, हमारे खेल मंत्रालय के कुछ आंकड़ा विशेषज्ञों ने दिया। -कोरोना को लेकर अपनी स्ट्रेटेजी के बारे में बताएंगे। -ज़रूर। देखिए कोरोना का पहला लेटर ‘सी‘ है तो हमने 'सी' को पकड़ लिया और कोरोना को कन्फ्यूज करने की रणनीति बनाई। मजे की बात ये रही कि हम सफल भी हुए। -कैसे? -हमने 14 घंटे का जनता कर्फ्यू ...

सीएए नागरिकता छीनने वाला नहीं नागरिकता देने वाला कानून है!

-सीएए पर देश में बवाल मचा हुआ है, थोड़ा विस्तार से बताएंगे कि सीएए है क्या बला? -सीएए नागरिकता छीनने वाला नहीं, नागरिकता देने वाला कानून है़। -फिर सीएए का एक महीने से देशव्यापी विरोध क्यों हो रहा है? -सीएए नागरिकता छीनने वाला नहीं नागरिकता देने वाला कानून है। -यह तो मेरे सवाल का जवाब नहीं हुआ? -सीएए नागरिकता छीनने वाला नहीं नागरिकता देने वाला कानून है। -अच्छा एनआरसी से सीएए का क्या संबंध है? -सीएए नागरिकता छीनने वाला नहीं नागरिकता देने वाला कानून है। -एनपीआर से इसका कोई संबंध है या नहीं, या फिर एनपीआर का एनआरसी से संबंध हो? दरअसल जनता में कन्फ्यूज़न है, जो आप दूर कर सकते हैं... -सीएए नागरिकता छीनने वाला नहीं, नागरिकता देने वाला कानून है। -ओके। ये शाह साहब की क्रोनोलॉजी हमें समझ नहीं आई। आप समझाएंगे तो मेहरबानी होगी... -सीएए नागरिकता छीनने वाला नहीं, नागरिकता देने वाला कानून है। -सीएए के तहत जब अफ़ग़ानिस्‍तान, पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश के प्रताड़ित धार्मिक अल्‍पसंख्‍यकों को सुरक्षा देने की कोशिश की ही जा रही है तो फिर उन्‍हीं देशों के बलूच, अहमदिया और शिया जैसे अन्‍य प्रताड़ित धार्म...

हमें ‘छपाक‘ नहीं देखनी, नहीं देखनी, नहीं देखनी!

 -आप ‘छपाक‘ का विरोध कर रहे है? -हां। करते हैं और अंतिम सांस तक करते रहेंगे। -क्यों फिल्म बहुत बुरी है? -हमारे लिये बुरी है। -क्यों? फिल्म अश्लीलता को बढ़ावा देती है? -नहीं। -तो क्या हिंसा को बढ़ावा देती है? -नहीं। -फिर तो जरूर इसमें अंडरवर्ल्ड का पैसा लगा होगा? -ऐसी अफवाह तो थी पर पुष्टि नहीं हो सकी। -कहीं फिल्म में कोई पाकिस्तानी कलाकार तो नहीं है? -नहीं। -या कोप्रोडक्शन हमारे ‘एनीमी नंबर टू‘ चीन की किसी फिल्म कंपनी ने किया हो? -हमें नहीं पता। -अच्छा। अब समझा। वो फिल्म में मुस्लिम खलनायक का नाम हिंदू कर दिया था, ऐसी खबर आई थी। क्या वह खबर है आपके गुस्से का कारण। -नहीं। वह तो अफवाह निकली। -फिर आप फिल्म का विरोध क्यों कर रहे हैं? -उसमें दीपिका पादुकोण है। -क्यों? क्या वह बुरी अभिनेत्री हैं? -नहीं। -तो फिर? उन्होंने आपका क्या बिगाड़ा है? -वह जेएनयू गई थीं। -जेएनयू बोले तो? -जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय। -विश्वविद्यालय? वहां दीपिका के जाने से क्या प्रॉब्लम है? -वह ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग‘ का अड्डा है? -तो दीपिका क्या वहां किसी गैंग में शामिल होने गई थीं? -ऐसा उन्होंने कहा तो नहीं। उन्ह...

सीएए, एनआरसी, एनपीआर के बीच कोई संबंध नहीं है जी!

-आपने कहा था, एक सौ तीस करोड़ देशवासी सीएए पर आपके साथ हैं। -बिलकुल हैं जी। फैसला ही उनका है। आखिर, सरकार और संसद उन्हीं की तो है। -तो फिर विरोध करने वाले कौन हैं? -कांग्रेसी, अर्बन नक्सल, देशद्रोही तत्व हैं जी। -आप कहना चाहते हैं कि विरोध प्रदर्शन करने वाले लाखों छात्र, युवा, महिलाएं कांग्रेसी, अर्बन नक्सल, देशद्रोही तत्व हैं? -नहीं जी। विरोध प्रदर्शनों को उकसाने वालों की बात कर रहा था मैं। अधिकांश प्रदर्शनकारियों को तो पता भी नहीं वह प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं। उन्होंने कानून ठीक से पढ़ा भी नहीं। -आपने पढ़ा? -ऑफ द रिकॉर्ड मानें तो पढ़ा तो ठीक से मैंने भी नहीं। -अच्छा, यह बताइये क्या यह प्रदर्शनकारी एक सौ तीस करोड़ के अतिरिक्त हैं? -नहीं जी। एक जर्मन स्टूडेंट था, एक कोरियाई लेडी थी, उन्हें तो हमने वापस उनके देश भेज दिया। -इसका मतलब है कि प्रदर्शनकारियों की संख्या को एक सौ तीस करोड़ में से माइनस करना चाहिये, तभी पता चलेगा कि कानून के समर्थन में कितने लोग हैं। नहीं? -नहीं जी। जैसाकि मैंने आपको बताया, ये गुमराह लोग हैं। अफवाहों पर विश्वास करने वाले। -अफवाहें बोले तो...

जम्मू-कश्मीर प्रशासन-मीडिया संवाद जय-मौसी इश्टाईल

वैसे तो मैं उसूलन बासी खबर नहीं देता पर आगे की पंक्तियाँ पढ़कर आप समझ जायेंगे कि वजह जेन्युइन है। आठ-दस दिन पहले की बात है। जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन की एक 'ऑफ द रिकॉर्ड' और गुप्त प्रेस कांफ्रेंस हुई। पता है, आप कहेंगे कि प्रेस कांफ्रेंस 'ऑफ द रिकॉर्ड' और गुप्त कैसे हो सकती है? हुआ यूं कि प्रेस कांफ्रेंस शुरू होने से पहले प्रशासन ने कह दिया कि ब्रीफिंग के बाद सभी सवालों के जवाब दिए जायेंगे पर मीडिया को वायदा करना होगा कि वह प्रशासन की बातों से सहमत हैं तो प्रेस कांफ्रेंस की खबर कहीं नहीं छपेगी। मीडिया भूल जाएगा कि कोई प्रेस कांफ्रेंस हुई थी, हां चूँकि विषय प्रदेश में नार्मल्सी के बारे में था इसलिए मीडिया देशहित में 'उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार', 'गोपनीय एवं विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार', 'नाम न छापने की शर्त पर वरिष्ठ अधिकारी ने बताया' जोड़कर खबर दे सकता है। संवाद कुछ-कुछ 'शोले' के जय और बसंती की मौसी के बीच उस दृश्य की तर्ज पर हुआ जिसमें जय मौसी को बसंती की शादी अपने दोस्त वीरू से करने के लिए राज़ी करने की कोशिश कर रहा है। और आखिरकार मौ...

"बोले तो पकौड़े बेचने के फैसले ने मेरी ज़िन्दगी बदल डाली!"

संपादक का फरमान था, एक पकौड़े बेचने वाले का इंटरव्यू करना था। सो मैं सड़क के किनारे एक ठेले पर पहुंचा। ठेले पर बोर्ड लगा था, "राम भरोसे रेस्तरां"। अच्छी-खासी भीड़ थी इसलिए ठेले के मालिक को बात करने के लिए मनाने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी। पेश है साक्षात्कार के कुछ महत्वूर्ण अंश:  "आप कब से पकौड़े बेचते हैं?" "जी, 16 मई 2014 से।" "उससे पहले क्या करते थे?" "बेरोजगार ही था।" "फिर अचानक पकौड़े तलने का खयाल कैसे आया?" "15 मई की रात एक महापुरुष सपने में आये और उन्होंने कहा 'बालक, तेरे दुःख भरे दिन बीत गये और अच्छे दिन आ गए है। कल से तू नौकरी के लिए दर-दर भटकना बंद कर दे, तुझे नौकरी मांगनी नहीं पगले नौकरी देनी है! तू कोई अपना काम शुरू कर!" "फिर...?" "फिर मैंने असमंजस में पूछा कि सर मैं क्या करूं? उन्होंने कहा चाय-पकौड़ी का ठेला लगा ले, दिन में 200 रुपये कहीं नहीं जायेंगे। बस फिर क्या था, यह दिव्य ज्ञान मिलने के बाद मैंने अगले दिन से ही यह 'राम भरोसे रेस्तरां' का बोर्ड लगाकर यह ठेला शुरू...

ब्रेकिंग न्यूज़ : 'पद्मावती' पर पर्यावरण विभाग ने रोक लगाईं! कहा, "बहुत ध्वनि प्रदूषण फैला रही है!"

पर्यावरण विभाग ने फिल्म 'पद्मावती' पर रोक लगा दी है! विभाग का कहना है कि फिल्म बहुत नॉइज़ पोल्यूशन यानी ध्वनि प्रदूषण फैला रही है ।  विभाग के एक उच्चाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस ज्वलंत मुद्दे पर एक आपात बैठक बुलाई गयी थी जिसमें मंत्री का प्रतिनिधित्व उनके निजी सहायक ने किया। इस बैठक में सर्वसम्मति से फिल्म को बैन करने का फैसला लिया गया। फैसले के अनुसार फिल्म को सिर्फ भारत में ही नहीं 'प्लेनेट अर्थ' पर बैन किया गया है क्योंकि ध्वनि प्रदूषण की समस्या सिर्फ भारत में तो है नहीं। बैठक के मिनट्स (जिसकी कॉपी इस संवाददाता के पास है) के हवाले से ख़ास अपने पाठकों के लिए हम यह सुपर एक्सक्लूसिव   रिपोर्ट आपके सामने पेश कर रहे हैं: बैठक की शुरुआत गगनभेदी 'वन्दे मातरम' और समापन 'भारत माता की जय' के नारों से हुई। बैठक का एजेंडा रखते हुए एक उच्चाधिकारी ने कहा कि ऊपर से आदेश है कि कुछ करना होगा, हम कुछ नहीं कर रहे, इसलिए कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों को क़ानून और व्यवस्था बिगड़ने की आशंका का हवाला देकर फिल्म को बैन करना पड़ रहा है, इसमें यह संके...

ये विचार लेखक के अपने नहीं हैं!

कभी-कभी लगता है कि हम 'पल्ला झाड़ू' युग में जी रहे हैं, जहाँ सब समस्या या विवाद तो 'क्रियेट' करना जानते हैं, करते भी हैं पर फंसने पर उसे 'ओन' करना नहीं जानते। कोई भी, कोई भी यानी कोई भी अपने कहे-किये की जिम्मेवारी नहीं लेना चाहता। ज़रा सा विवाद हुआ कि वह उस विवादस्पद बयान/कार्य से पल्ला झाड़ लेता है यह कहकर कि ऐसा उसने कहा ही नहीं, उसकी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया, उसका यह मतलब नहीं था या कि यह उसके निजी विचार थे/नहीं थे। आखरी बहाना इस पर निर्भर करता है कि उसकी जान किस सूरत में बच सकती है। बरसों पहले टीवी पर एक धारावाहिक में 'डिस्क्लेमर' देखा था, यह धारावाहिक ऐसा कोई दावा नहीं करता कि यह इतिहास दर्शा रहा है, धारावाहिक के सभी पात्र काल्पनिक हैं और इसका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन करना है वगैरह वगैरह।।। बाद में तो डिस्क्लेमर फैशन ही बन गया। फलां धारावाहिक का उद्देश्य बाल विवाह को बढ़ावा देना नहीं है, फलां धारावाहिक का उद्देश्य नारियों पर अत्याचार को बढ़ावा देना नहीं है, फलां धारावाहिक का उद्देश्य बच्चों के शोषण को बढ़ावा देना नहीं है, फलां धारावाहिक का उद...

सब विपच्छ का दोष है!

पिछले तीन सालों में हमारे देश में एक नया रहस्योद्घाटन हुआ है, वह यह कि देश की सभी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार विपक्ष है। देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा विपक्षी दल हैं। देश का अगर विकास हुआ है (और हुआ तो होगा ही), तो वह विपक्ष के कारण नहीं बल्कि विपक्ष के बावजूद हुआ है और जो नहीं हुआ तो उसका ज़िम्मेदार विपक्ष है। यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि तीन साल पहले तक की सरकारें कमज़ोर और नाकारा थीं और अब विपक्ष कमज़ोर और नाकारा है। विपक्ष कमज़ोर और नाकारा तो है ही विभिन्न विपक्षी दलों में कोई एकता भी नहीं है। अब इसके लिए आप सरकार को तो दोष नहीं न दे सकते। सरकार देश चलाये या विपक्षी एकता की चिंता करे?     चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, न जाने कितने राजनीतिक पंडित यह लिखते-बोलते नहीं थकते कि साहब हमारे देश का विपक्ष मज़बूत होता तो फलां मुद्दे पर सरकार को फाड़ देता, फलां मुद्दे पर सरकार को चीर देता। विपक्ष में दम होता तो सरकार इतनी निरंकुश न होती। सरकार की मजाल न होती कि वह कोई गलत कदम उठाती, मनमाने फैसले लेती, पर अफ़सोस हमारा विपक्ष इतना कमज़ोर, इतना नाकारा है...

मेरा कैलेंडर बदल रहा है...

कोई नहीं जी!/ महेश राजपूत मेरा कैलेंडर बदल रहा है. पहले मेरे कैलेंडर पर एक सफाचट बूढ़े आदमी की तस्वीर थी. नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था. शरीर की हड्डियाँ दिखती थीं. छाती की साइज़ जो भी हो ५६ इंच तो हरगिज़ नहीं थी. वज़न ४०-४५ किलो हो तो बहुत हो गया. शरीर पर कपड़ो के नाम पर केवल एक धोती हुआ करती थी. किसी एंगल से खाते-पीते घर का नहीं लगता था. कहते हैं उसीने हमें आज़ादी जैसी 'बेकार सी चीज़' दिलाई. चरखा चलाकर अंग्रेजों को भगाया. अब यह भी कोई मानने की बात है? खैर, यह ७० साल पहले की बात है. यह भी कहते हैं वह शुरू से 'गरीब' नहीं था, कभी सूट पहनकर विदेश यात्रा करता था. फिर अचानक क्या सनक सवार हुई कि सूट फेंककर धोती अपना ली. कहता था कि देश में कितने लोग हैं जिनके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं. अगर अमीर लोग कम कपड़े पहनें तो गरीबों का तन ढंकने में मदद होगी. यह भी कोई बात है? जाहिर है उसके पास विकास का 'कांसेप्ट' ही नहीं था. जो आदमी अपना विकास नहीं कर सकता वह भला देश का विकास कैसे करेगा? वह कहता था प्रशासकों को कोई भी फैसला करते समय समाज के सबसे पिछड़े/गरीब व्यक्ति के बारे मे...

२,००० के नोट का छुट्टा!

सरकार ने माना है कि २,००० रुपये का नोट लाने से थोड़ी परेशानी हुई है. एक कैबिनेट पेपर में कहा गया है, "इस बड़े नोट के लिए अक्सर छुट्टा नहीं मिलता और इसे हल करने के लिए हम २,००० के नोट का तुरंत प्रभाव से विमुद्रीकरण प्रस्तावित करते हैं. कृपया इन्हें जमा कराएं और आप अपना पैसा प्रति दिन दो सिक्के प्रति व्यक्ति की सीमा के साथ, १ रुपये के सिक्कों में ले सकते हैं. इससे आतंकवाद, पशु क्रूरता और पार्किंग की समस्याएं समाप्त हो जायेंगी." आरबीआई गवर्नर ने अपनी अधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा है, "बिलकुल, यक़ीनन." साभार: आकार पटेल के "मुंबई मिरर" के १३ जनवरी २०१७ के अंक में प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ "माय बैड" में "आइडियाज दैट कैन 'हिट' यू इन २०१७" शीर्षक से छपे लेख में से