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जम्मू-कश्मीर प्रशासन-मीडिया संवाद जय-मौसी इश्टाईल

वैसे तो मैं उसूलन बासी खबर नहीं देता पर आगे की पंक्तियाँ पढ़कर आप समझ जायेंगे कि वजह जेन्युइन है। आठ-दस दिन पहले की बात है। जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन की एक 'ऑफ द रिकॉर्ड' और गुप्त प्रेस कांफ्रेंस हुई। पता है, आप कहेंगे कि प्रेस कांफ्रेंस 'ऑफ द रिकॉर्ड' और गुप्त कैसे हो सकती है? हुआ यूं कि प्रेस कांफ्रेंस शुरू होने से पहले प्रशासन ने कह दिया कि ब्रीफिंग के बाद सभी सवालों के जवाब दिए जायेंगे पर मीडिया को वायदा करना होगा कि वह प्रशासन की बातों से सहमत हैं तो प्रेस कांफ्रेंस की खबर कहीं नहीं छपेगी। मीडिया भूल जाएगा कि कोई प्रेस कांफ्रेंस हुई थी, हां चूँकि विषय प्रदेश में नार्मल्सी के बारे में था इसलिए मीडिया देशहित में 'उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार', 'गोपनीय एवं विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार', 'नाम न छापने की शर्त पर वरिष्ठ अधिकारी ने बताया' जोड़कर खबर दे सकता है। संवाद कुछ-कुछ 'शोले' के जय और बसंती की मौसी के बीच उस दृश्य की तर्ज पर हुआ जिसमें जय मौसी को बसंती की शादी अपने दोस्त वीरू से करने के लिए राज़ी करने की कोशिश कर रहा है। और आखिरकार मौ...

कंटीली तारों से घायल खबर : कश्मीर की सूचनाबंदी - 3

(एनडब्ल्यूएमआई-एफएससी रिपोर्ट) हमारी तहकीकात की प्रमुख बातें: सेंसरशिप और समाचारों पर नियंत्रण हालांकि कोई अधिकारिक सेंसरशिप या बैन लागू नहीं है पर संचार चैनलों की कमी और आवाजाही पर प्रतिबंधों के कारण पत्रकारों को समाचार जुटाने के निम्नलिखित क़दमों में समस्या आ रही है:        इन्टरनेट और फ़ोन बंद होने के कारण घटनाओं के बारे में जानकारी मिलने या संपर्कों और स्रोतों से जानकारी मिलने में       कहीं आ-जा न पाने के कारण, कुछ इलाकों में प्रवेश पर पाबंदियों से, समाचार जुटाना बाधित हो रहा है       खुद या गवाहों से पुष्टि करने से रोके जाने, आधिकारिक स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करने से मना करने के कारण समाचारों की विश्वसनीयता से समझौते के खतरे हैं        संपादकों से ईमेल अथवा फ़ोन पर तथ्यों की पुष्टि के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब न दे पाने के कारण या ख़बरों में सुधार न कर पाने के कारण ख़बरें छप नहीं पा रही हैं। केवल एक खबर मीडिया केंद्र में जाकर अपलोड करना काफी नहीं है यदि आप सवालों के जवाब देने के लिए...

कंटीली तारों से घायल खबर : कश्मीर की सूचनाबंदी - 2

(एनडब्ल्यूएमआई-एफएससी रिपोर्ट) गिरफ्तारियां, धमकियाँ और जांच त्राल से इरफ़ान मलिक पहले पत्रकार थे जिन्हें 5 अगस्त की बंदी के बाद हिरासत में लिया गया। यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें आखिर क्यों हिरासत में लिया गया। एक और पत्रकार क़ाज़ी शिबली को अनंतनाग से बंदी से पहले ही हिरासत में लिया गया था, संभवत: सैन्य बलों की   तैनाती के बारे में ट्वीट करने के कारण। पत्रकारों से पुलिस और जांच अधिकारियों ने कुछ संवेदनशील ख़बरों को लेकर पूछताछ की है और उन पर अपने स्रोत बताने का दबाव भी डाला गया है। कुछ प्रमुख अखबारों के संपादकों को भी दबी जुबां धमकी दी गयी है कि उनसे जांच अधिकारी पूछताछ कर सकते हैं। दबाव की नीतियां अपनाने का एक और उदाहरण वरिष्ठ   अंतर्राष्ट्रीय और   प्रतिष्ठित स्वतंत्र राष्ट्रीय मीडिया के साथ काम करने वाले पत्रकारों फ़याज़ बुखारी, एजाज़ हुसैन और नज़ीर मसूदी को प्रताड़ित करने के प्रयास में मौखिक रूप से सरकार की तरफ से दिया गया घर खाली करने को कहा गया है। स्तंभकार और लेखक गोहर गिलानी को 31 अगस्त को विदेश जाने से रोकना, कश्मीरी आवाजों को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पहुँचने ...

कश्मीर और नोट बंदी फैसलों में समानताएं... और कुछ फर्क

आठ नवंबर 2016 को टीवी से अचानक नोटबंदी की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद की थी। पांच अगस्त 2019 को कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 5ए हटाने की घोषणा गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में की। दोनों घोषणाओं से पहले सरकार में भी (मंत्रियों-अफसरों, सहयोगी दलों या पार्टी में भी) कोई चर्चा की गई हो, ऐसा लगता नहीं है। उंगलियों पर गिनने लायक लोगों के बीच चर्चा हुई हो तो बात अलग है। नोटबंदी और कश्मीर से अनुच्छेद 370 व 35ए हटाने तथा जम्मू कश्मीर के विभाजन, जम्मू व कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने, लद्दाख को ‘म्युनिसीपालिटी‘ बनाने के फैसले में समानताएं यहीं खत्म नहीं हो जातीं। काफी सारी समानताएं हैं दोनों फैसलों में। कुछ फर्क भी हैं। पर पहले समानताओं की बात कर लेते हैं। दोनों फैसले घोर जनविरोधी हैं। दोनों फैसले ‘तुगलकी‘ फरमान के रूप में सामने आए यानी जनता को कोई पूर्वाभास नहीं होने दिया गया, विश्वास में तो लेने की खैर कोई बात ही नहीं है। दोनों फैसलों में आंतकवाद मिटाने को एक बहाना बनाया गया। नोट बंदी के समय जहां काला धन, भ्रष्टाचार और जाली करंसी समाप्त करने की बात सामने थी और आतंकवाद, नक्सलव...

सबका नंबर आएगा...!

एडिटर्स गिल्ड को एक बयान जारी करना पड़ा है कि कश्मीर में मीडिया (स्थानीय मीडिया समेत) को काम करने दिया जाए। पांच दिन से कश्मीर देश से कटा हुआ है। कश्मीर में वास्तविक स्थिति की खबर ना बाहर आ रही है और ना कश्मीर में बाहर से खबर अंदर जाने दी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कुछेक संस्थानों (समाचार पोर्टलों समेत) से प्रतिरोध/विरोध की खबरें आ रही हैं, सरकारी तत्व और बीजेपी उन्हें अफवाह और कुप्रचार करार दे रहे हैं। कुछ सकारात्मक खबरें आ रही हैं तो विरोधी कह रहे हैं कि यह खबरें सरकार प्लांट करवा रही है, जोकि पूरी तरह गलत भी नहीं है। दरअसल, युद्ध के समय भी मीडिया (अंतरराष्ट्रीय मीडिया समेत) को एक्सेस दिया जाता है, ऑफिशियल ब्रीफिंग होती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपकी छवि खराब ना हो, इसलिए। क्या कश्मीर में कोई युद्ध चल रहा है? नहीं! फिर यह सरकार ऐसा क्यों कर रही है? क्योंकि उसे पता है कि मीडिया के एक बड़े हिस्से को मैनेज किया जा सकता है। पुलवामा हमले और बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद वह ऐसा सफल प्रयोग कर चुकी है। कथित मुख्यधारा के मीडिया के एक बड़े हिस्से को सरकार ने कैरेट एंड स्टिक नीति अ...