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चुनावपूर्व पुल दुर्घटनाएं कैसे कवर करें पत्रकार? डूज़ एंड डोंट्स

डिस्क्लेमर: यह लेख पाठ्यपुस्तकों में शामिल कराने के पवित्र उद्देश्य के साथ लिखा गया है। विषय चूंकि मीडिया से संबंधित है इसलिए अपेक्षा है कि इसे सरकारी, अर्ध सरकारी व निजी मीडिया संस्थानों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। कोई और समय होता तो यह लेख लिखने की आवश्यकता ही नहीं होती लेकिन समय ऐसा है कि मीडिया जगत से ‘देशद्रोहियों‘ को जेलों में ठूंसकर लाइन पर लाने का काम उतनी तेजी  से नहीं हो पा रहा है, जितनी तेजी से होना चाहिए था। खासकर सोशल मीडिया में तो इनका ही बोलबाला है सो कोई भी त्रासद दुर्घटना होने पर उसका कवरेज कैसे किया जा चाहिए, कैसे नहीं किया जाना चाहिए यानी ‘डूज़‘ क्या हैं, ‘डोंट्स‘ क्या हैं, यहां  बताया जा रहा है। आशा है कि मीडिया के छात्रों के लिए यह लेख उपयोगी साबित होगा। 

डूज़ 

-पॉजिटिव बनें। संवेदनशील बनें। 

-यह जरूर बताएं कि पुल कितने सौ वर्ष पुराना था? और पुल पर क्षमता से बहुत ज्यादा लोग थे। 

-लोगों की लापरवाही या चूक, जैसे उन्होंने प्रशासन के निर्देशों/चेतावनियों का पालन नहीं किया और वह खुद ही दुर्घटना के लिए जिम्मेदार थे, को हाइलाईट करें।

-दुर्घटना में कितने मरे? के बजाय फोकस कितनों को बचाया गया पर करें।

-दुर्घटना में पुलिस-प्रशासन के किये राहत एवं बचाव कार्यों को हाईलाईट करें। 

-सत्ता पक्ष की तरफ से मुआवजे की घोषणाओं को प्रमुखता से दें।

-पीड़ितों से मिलने अस्पताल पहुंचे पीएम/सीएम/मिनिस्टरों की तस्वीरों को समाचार का हिस्सा जरूर बनाएं। उनके “मैं कहीं भी रहूं पर मेरा ह्दय पीड़ितों के साथ“ जैसे भावनात्मक बयानों को समुचित स्थान दें यानी एंकर बनाएं क्योंकि दुर्घटना की खबरों के कंज्यूमरों सॉरी रीडरों को इमोशनल तड़के वाली ह्यूमन एंगल स्टोरीज़ भी पढ़नी होती हैं।

-पीड़ितों के और विपक्षी नेताओं के बयानों को अंडरप्ले करें और उन्हें केवल “दु:खद“, “त्रासद“, “दुर्भाग्यपूर्ण“ तक सीमित रखें। वह प्रशासन या सरकार से सवाल पूछें, उल्टे-सीधे आरोप लगायें या इस्तीफा मांगने जैसी हरकतें करें तो बयानों की पूरी तरह अनदेखी/अनसुनी कर सकते हैं।

डोंट्स

-दुर्घटना पर किसी को (विपक्षी राजनीतिक दलों को खासकर) राजनीति न करने दें।

-पुल की हाल में लाखों या करोड़ों रुपये फूंक कर मरम्मत की गई है तो यह जानकारी सार्वजनिक न करें।

-पुल की मरम्मत किस कंपनी या ठेकेदार ने किस प्रशासनिक या सरकारी अधिकारी या महकमे के निर्देशों पर की, बिल्कुल न बताएं।

-पुल को ‘फिटनेस सर्टीफिकेट‘ मिला या नहीं, इस चक्कर में न पड़ें।

-दुर्घटना ‘एक्ट ऑफ गॉड‘ है या ‘एक्ट ऑफ फ्रॉड‘ पता करने के चक्कर में न पड़ें और न शर्लाक होम्स के भतीजे/भतीजी बनकर खुद इन्वेस्टीगेशन करें।

-व्यवस्था से सवाल न करें, व्यवस्था की आलोचना न करें क्योंकि जनता व्यवस्था के लिए होती है व्यवस्था जनता के लिए नहीं।

-ज्यादा फालोअप के चक्कर में न पड़ें। एक बार डीसी या टीसी खबर देकर छोड़ दें। आप भूल जाएं और दूसरों को भूलने दें।

(विशेष नोट: बताने की जरूरत नहीं है कि यह निर्देश केवल ऐसे प्रदेशों में दुर्घटना होने की सूरत में लागू होते हैं जहां ‘डबल इंजन‘ की सरकार हो।)


कोई नहीं जी!



 








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