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Showing posts with the label कोई नहीं जी!

चुनावपूर्व पुल दुर्घटनाएं कैसे कवर करें पत्रकार? डूज़ एंड डोंट्स

डिस्क्लेमर: यह लेख पाठ्यपुस्तकों में शामिल कराने के पवित्र उद्देश्य के साथ लिखा गया है। विषय चूंकि मीडिया से संबंधित है इसलिए अपेक्षा है कि इसे सरकारी, अर्ध सरकारी व निजी मीडिया संस्थानों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। कोई और समय होता तो यह लेख लिखने की आवश्यकता ही नहीं होती लेकिन समय ऐसा है कि मीडिया जगत से ‘देशद्रोहियों‘ को जेलों में ठूंसकर लाइन पर लाने का काम उतनी तेजी  से नहीं हो पा रहा है, जितनी तेजी से होना चाहिए था। खासकर सोशल मीडिया में तो इनका ही बोलबाला है सो कोई भी त्रासद दुर्घटना होने पर उसका कवरेज कैसे किया जा चाहिए, कैसे नहीं किया जाना चाहिए यानी ‘डूज़‘ क्या हैं, ‘डोंट्स‘ क्या हैं, यहां  बताया जा रहा है। आशा है कि मीडिया के छात्रों के लिए यह लेख उपयोगी साबित होगा।  डूज़  -पॉजिटिव बनें। संवेदनशील बनें।  -यह जरूर बताएं कि पुल कितने सौ वर्ष पुराना था? और पुल पर क्षमता से बहुत ज्यादा लोग थे।  -लोगों की लापरवाही या चूक, जैसे उन्होंने प्रशासन के निर्देशों/चेतावनियों का पालन नहीं किया और वह खुद ही दुर्घटना के लिए जिम्मेदार थे, को हाइलाईट कर...

जम्मू-कश्मीर प्रशासन-मीडिया संवाद जय-मौसी इश्टाईल

वैसे तो मैं उसूलन बासी खबर नहीं देता पर आगे की पंक्तियाँ पढ़कर आप समझ जायेंगे कि वजह जेन्युइन है। आठ-दस दिन पहले की बात है। जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन की एक 'ऑफ द रिकॉर्ड' और गुप्त प्रेस कांफ्रेंस हुई। पता है, आप कहेंगे कि प्रेस कांफ्रेंस 'ऑफ द रिकॉर्ड' और गुप्त कैसे हो सकती है? हुआ यूं कि प्रेस कांफ्रेंस शुरू होने से पहले प्रशासन ने कह दिया कि ब्रीफिंग के बाद सभी सवालों के जवाब दिए जायेंगे पर मीडिया को वायदा करना होगा कि वह प्रशासन की बातों से सहमत हैं तो प्रेस कांफ्रेंस की खबर कहीं नहीं छपेगी। मीडिया भूल जाएगा कि कोई प्रेस कांफ्रेंस हुई थी, हां चूँकि विषय प्रदेश में नार्मल्सी के बारे में था इसलिए मीडिया देशहित में 'उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार', 'गोपनीय एवं विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार', 'नाम न छापने की शर्त पर वरिष्ठ अधिकारी ने बताया' जोड़कर खबर दे सकता है। संवाद कुछ-कुछ 'शोले' के जय और बसंती की मौसी के बीच उस दृश्य की तर्ज पर हुआ जिसमें जय मौसी को बसंती की शादी अपने दोस्त वीरू से करने के लिए राज़ी करने की कोशिश कर रहा है। और आखिरकार मौ...

फासीवाद का लोकतंत्र के दरवाजे पर दस्तक देना, कर देना लोकतंत्र को बेघर!

(ठिठुरती रात थी। फासीवाद ने लोकतंत्र के दरवाजे पर दस्तक दी।) लोकतंत्र : (अंदर से) कौन है? फासीवाद : मैं फासीवाद। लोकतंत्र : क्या चाहिए? फासीवाद : बहुत ठंड है, दो घड़ी तुम्हारे घर बिताना चाहता हूं। लोकतंत्र : बस, दो घड़ी? फासीवाद : हां, यार। क्या सारी बातें अंदर बैठे-बैठे करोगे? (लोकतंत्र ने दरवाजा खोल दिया। फासीवाद अंदर जाकर कार्पोरेट के नरम लेकिन गरम सोफे पर बैठ गया।) फासीवाद : (सेटल होने के बाद) बहुत हालत खराब है भाई। थोड़ी दया करो। (लोकतंत्र पसीजने लगा। बहुत समय नहीं हुआ जब साम्राज्यवाद को ‘तड़ीपार‘ करने के बाद फासीवाद को भी घरनिकाला दिया गया था। फासीवाद के शरीर पर न के बराबर कपड़े थे जबकि लोकतंत्र समाजवाद की जैकेट, सर्वधर्म समभाव का मफलर और न्याय की टोपी आदि पहने था। सब पर प्रायोजक पूंजीवादी कंपनियों के लेबल लगे हुए थे।) लोकतंत्र : क्या चाहिए? फासीवाद : मफलर दे देते तो मेहरबानी होती (लोकतंत्र ने दे दिया। बाद में धीरे-धीरे फासीवाद ने लोकतंत्र को इमोशनल ब्लैकमेल कर जैकेट और टोपी भी ले ली। अब लोकतंत्र खुद ठिठुरने लगा। पर करता क्या उसने फासीवाद को घर में प्रवेश कराकर खुद अपने पैर...

माफ़ी तो आपको मांगनी ही होगी!

देश के नंबर वन नॉइज़ चैनल पर गर्मागर्म डिबेट चल रही थी। मैं सर्फिंग करते-करते थोड़ी देर से उस चैनल पर पहुंचा इसलिए मालूम नहीं प ड़  रहा था कि मामला क्या था? जब मैंने देखना शुरू किया डिबेट शुरू हुए करीब आठ मिनट हो चुके थे। यूं तो एंकर के सामने आठ-दस मेहमान थे पर एंकर एक मेहमान से ही रूबरू था जो किसी विपक्षी पार्टी का नुमाइंदा था। एंकर कह रहा था... एंकर : माफ़ी तो आपको मांगनी ही होगी। मेहमान : लेकिन... एंकर : हम आपकी कोई बात नहीं सुनेंगे। पहले आप माफ़ी मांगें। मेहमान : पर... एंकर : पर-वर कुछ नहीं आप माफ़ी मांगिये।  मेहमान : मेरी बात तो सुन... एंकर : राष्ट्र को कुछ नहीं सुनना। आप सिर्फ माफ़ी मांगिये। मेहमान : मेरे भाई... एंकर : मैं आपका भाई नहीं हूँ। मैंने जो कहा आप कीजिये... माफ़ी मांगिये। मेहमान : किस बात... एंकर : बात गई तेल लेने। मैंने बोल दिया तो बोल दिया। आप मुझे यह बताइये कि आप माफ़ी मांग रहे हैं या नहीं... इस बीच श्रीमतीजी आ गयीं और रिमोट उठाकर चैनल बदल दिया। मैंने कहा, "बहुत इंट्रेस्टिंग डिबेट थी।" उन्होंने कहा, "थोड़ी देर बाद देख लेना, डिबेट कहा...

यह गलत बात है!

(डिस्क्लेमर: इस लेख में शब्द मेरे हैं पर भावनाएं सत्तारूढ़ पार्टी के एक नेता की हैं। दरअसल हुआ यूं कि अपनी ट्रोल आर्मी के सदस्यों (यह मेरे शब्द हैं, उन्होंने 'सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स' लिखा था) से उन्होंने एक भावुक अपील की। मुझे लगा इस अपील को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहिए इसलिए यहाँ पेश कर रहा हूँ।) प्रिय सोशल मीडिया एक्टिविस्ट बंधुओं, पहले तो मैं आप लोगों की तारीफ़ करना चाहूँगा कि आप सोशल मीडिया पर देश, धर्म और समाज से जुड़े ज्वलंत मुद्दे उठाते रहते हो और जनता को जागरूक करते रहते हो। आप जो सवाल उठाते हो वह गंभीर और बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। बस, आपकी भाषा ज़रा गड़बड़ है। आप ही बताइये, सोशल मीडिया पर संवाद करते समय भाषा में क्या अश्लीलता, नफरत और हिंसा को उचित ठहराया जा सकता है? आपका बड़ा भाई होने के नाते मैं कहूँगा, "नहीं ठहराया जा सकता।" यह गलत बात है! ख़ास कर तब तो बिलकुल नहीं जब ऐसी भाषा का इस्तेमाल अपनों के खिलाफ ही किया जाए। क्या गैरों की कमी है जो हम अपनों को निशाना बनाएं? मित्रो, आपको यह तो सोचना चाहिए कि हमारे सुप्रीम लीडर आपको फॉलो करते हैं...

(55) घंटे का सीएम!

सचमुच हमारे देश का कुछ नहीं हो सकता! बताइए न ऐसे देश का हो भी क्या सकता है जहाँ विपक्षी इतने बदमाश हों कि युगों-युगों तक सीएम बने रहने के काबिल एक शख्स को 55 घंटे का सीएम बना दिया जाए! इतनी बड़ी साज़िश! इतनी गहरी साज़िश! दो पार्टियों (कांग्रेस और जनता दल सिक्युलर) ने पहले तो यह इम्प्रैशन दिया कि वह एक दूसरे के खिलाफ लड़ रही हैं। फिर जनता को कन्फ्यूज़ कर ऐसे परिणाम लाये कि देश और सभी राज्यों में शासन करने लायक एकमात्र स्वाभाविक पार्टी यानी बीजेपी को 'सिंगल लार्जेस्ट पार्टी' तो बनवा दिया पर बहुमत के आंकड़े से दूर रखा। फिर नतीजे आते ही आनन-फानन अनैतिक गठजोड़ कर सरकार बनाने का दावा ठोंक दिया ताकि बीजेपी को लगे कि हाय, देर करने से गाड़ी छूट न जाए और वह भी बिना सोचे-समझे दावा ठोंक दे! फिर राज्यपाल को मजबूर कर दिया कि वह येदुरप्पाजी को सरकार बनाने का न्योता दे! आप पूछेंगे मजबूर कैसे? अरे भाई सोशल मीडिया में इतना हल्ला मचा दिया कि कभी पीएम (तब गुजरात के सीएम) थे के लिए सीट छोड़ने वाले वाजूभाई वाला तो बीजेपी के प्रत्याशी को ही बुलाएँगे कि उनकी जगह बैठा कोई भी व्यक्ति सोचता कि विपक्षी उनकी बा...

मुझको राजाजी माफ़ करना, गलती म्हारे से हो गयी!

( डिस्क्लेमर: यह किस्सा पूरी तरह कपोल कल्पित नहीं है यानी इसमें छटांग भर सच्चाई भी है और यह लेखक ऐसा कोई दावा नहीं करता कि इससे किसीकी भावनाएं आहत नहीं होंगी इसलिए आगे अपने रिस्क पर पढ़ें. बाद में मत कहना पहले वार्न नहीं किया था, धन्यवाद!) मामला संगीन था, हाल में चोरी की एक बड़ी वारदात को अंजाम देने वाले एक चोर के साथ राजा की फोटू छापे में छप गयी थी! तरह-तरह की चर्चाएँ राज्य में हो रही थीं. जनता का एक वर्ग चोर से लगभग रश्क करते हुए इस तरह की बातें कर रहा था, "कितना बड़ा चोर है, दम है बंदे में! सीधे राजा तक पहुँच!", "अब काहे का डर जब सैयां भये राजाजी!" दूसरा वर्ग आपस में इस तरह की बात कर रहा था. "भला राजा को एक चोर के साथ फोटू खिंचवाने की क्या ज़रुरत थी? क्या सारे साधु-संत जेल में डाल दिए गए हैं क्या?" गनीमत थी छापे में फोटू छपने की बात अभी राजा तक नहीं पहुंची थी. राजा के सलाहकारों की तो हालत खराब थी. सो, उन्होंने एक सीक्रेट मीटिंग बुलाई. मीटिंग का एजेंडा था कि राजा तक यह खबर कैसे पहुंचाई जाए कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. इतना तो तय था कि आज ...

अच्छे दिनों की ट्रेन अनिश्चितकालीन देरी से चल रही है! असुविधा के लिए खेद है!

कार्टून साभार : राजेंद्र धोड़पकर,  जैसी-तैसी सत्याग्रह अच्छे दिनों की ट्रेन का इंतज़ार कर रहे सभी भारतीय कृपया ध्यान दें, अच्छे दिनों की ट्रेन अनिश्चितकालीन देरी से चल रही है और 16 मई 2014 को पहुँचने वाली ट्रेन अभी हमें मिली जानकारी के अनुसार 2019 तक तो नहीं पहुँचने वाली। यात्रियों की असुविधा के लिए हमें खेद है! इससे पहले कि आप आक्रोशित हों, हमें अपशब्दों से नवाजें या तोड़फोड़ जैसी देशद्रोही गतिविधियां शुरू करें, हम आपसे अनुरोध करना चाहेंगे कि यह देश आपकी ही संपत्ति (हमें तो केवल इसे मैनेज करने का ठेका मिला हुआ है) है कृपया इसे नुकसान न पहुंचाएं अन्यथा हमें कानून और व्यवस्था बनाये रखने के लिए आप पर लाठी और गोली चलानी पड़ सकती है। इस वैधानिक चेतावनी के बाद वैसे हमें तो आपको कोई सफाई देने की ज़रुरत नहीं हैं पर फिर भी आपको ट्रेन के लेट होने के कारण बता देते हैं। आप सवा सौ करोड़ भारतीय हो और अच्छे दिनों की ट्रेन एक। अब वैसे भी इसमें सब एक साथ सवार नहीं हो सकते। इसलिए ट्रेन को अभी यार्ड से निकाला ही नहीं गया है। इसमें डिब्बे जोड़े जाने का काम चल रहा है ताकि सभी भारतीय इसमें सवार...