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क्या करें कंट्रोल नहीं होता..................डैमेज!

कुछ तो भी बड़ा पंगा हो गया था। रूलिंग पार्टी, उसे रिमोट कण्ट्रोल से चलाने वाले संगठन के डैमेज कण्ट्रोल बोर्ड की आपात बैठक बुलाई गयी थी। सारे लोग आ चुके थे इसलिए बैठक तुरंत शुरू की गयी और संगठन के नुमाइंदे ने बोलना शुरू किया: "स्साला, यह देश चलाना आसान नहीं है, बहुत टेंशन का काम है। रोज़ कोई न कोई पंगा हो जाता है।" सबने चेहरे पर गंभीरता लाकर, मुंडी हिलाकर चीफ की बात का अनुमोदन किया। चीफ को रिएक्शन अच्छा लगा। उन्होंने बोलना जारी रखा, "सबको पता है न क्या करना है।" सबने फिर मुंडी हिलाई। चीफ को इस बार सिर्फ मुंडी हिलाना जंचा नहीं, नकली गुस्से का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने  कहा, "मुंडी नहीं हिलाने का, बोलने का।" सबने एक स्वर में कहा, "हाँ, पता है।" चीफ ने कहा, "क्या ख़ाक पता है। अगर तुम सब लोग अपना काम ठीक से करते तो यह नौबत ही नहीं आती। मेरे कहने का मतलब है, भले हम डैमेज कण्ट्रोल बोर्ड हैं, पर डैमेज होने के बाद कण्ट्रोल करने का क्या मतलब है? कभी-कभी हमें डैमेज एंटीसीपेट करना चाहिए और उसे होने ही नहीं देना चाहिए।" सबने फिर मुंडी हि...

सब विपच्छ का दोष है!

पिछले तीन सालों में हमारे देश में एक नया रहस्योद्घाटन हुआ है, वह यह कि देश की सभी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार विपक्ष है। देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा विपक्षी दल हैं। देश का अगर विकास हुआ है (और हुआ तो होगा ही), तो वह विपक्ष के कारण नहीं बल्कि विपक्ष के बावजूद हुआ है और जो नहीं हुआ तो उसका ज़िम्मेदार विपक्ष है। यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि तीन साल पहले तक की सरकारें कमज़ोर और नाकारा थीं और अब विपक्ष कमज़ोर और नाकारा है। विपक्ष कमज़ोर और नाकारा तो है ही विभिन्न विपक्षी दलों में कोई एकता भी नहीं है। अब इसके लिए आप सरकार को तो दोष नहीं न दे सकते। सरकार देश चलाये या विपक्षी एकता की चिंता करे?     चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, न जाने कितने राजनीतिक पंडित यह लिखते-बोलते नहीं थकते कि साहब हमारे देश का विपक्ष मज़बूत होता तो फलां मुद्दे पर सरकार को फाड़ देता, फलां मुद्दे पर सरकार को चीर देता। विपक्ष में दम होता तो सरकार इतनी निरंकुश न होती। सरकार की मजाल न होती कि वह कोई गलत कदम उठाती, मनमाने फैसले लेती, पर अफ़सोस हमारा विपक्ष इतना कमज़ोर, इतना नाकारा है...