यह संवाद है सुनीता का, जो फिल्म 'थप्पड़' में अमृता के घर में सहायिका है। वह अमृता को बता रही होती है कि जब भी उसे उसका पति मारता है, वह घर से निकलकर बाहर से कुंडी लगा देती है। लेकिन उसकी यह आशंका बनी रहती है कि किसी दिन उसके पति अंदर से कुंडी लगा दी तो? तो वह कहां जायेगी?? 'थप्पड़' एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर बनी एक महत्वपूर्ण फिल्म है। लेकिन इसके केंद्र में एक मध्य वर्ग की बेहद खूबसूरत, पढ़ी-लिखी लड़की का होना इसे कॉमर्शियल टच भी देता है और विषय की गंभीरता भी थोड़ी कम करता है। संक्षेप में फिल्म की कहानी यूं है कि अमृता के एक सफल और प्रसन्न गृहिणी होने का भ्रम टूटता है, जब एक पार्टी में उसका पति सबके सामने उसे थप्पड़ मार देता है। बाद में वह थप्पड़ को कार्यस्थल की कुंठा का नतीजा बताकर वह बाद में जस्टीफाई करने की कोशिश करता है। पर अमृता जिसने कॉलेज के समय ज़िंदगी से सिर्फ दो ही बातों, सम्मान और खुशी, की अपेक्षा की थी, वह इसे स्वीकार नहीं कर पाती और कुछ सोच-विचार के बाद घर छोड़कर मायके चली जाती है। बाद में जब उसका पति कानूनी रास्ते से उसे जबरन घर लान...