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ये नयन डरे-डरे...

    हिचकॉक की फिल्म 'रिबेका' की नक़ल कर बनी 'कोहरा' का मनुहार गीत है, 'ये नयन डरे-डरे'। अपमानित व उपेक्षित महसूस कर रही पत्नी को पति मनाने की कोशिश कर रहा है और इस एक गीत में राजश्री उर्फ राज (वहीद रहमान), जो अमित (बिस्वजीत) की दूसरी पत्नी है, अमित की पहली पत्नी पूनम की मौत के बावजूद उसकी वैवाहिक जीवन में ग्रहण जैसी उपस्थिति से आक्रांत है, अमित की प्रेमिका बनती है और फिर मांग में सिंदूर भरवा कर पत्नी का हक पाती है। मुखड़ा है : ये नयन डरे-डरे ये जाम भरे-भरे ज़रा पीने दो कल की किसको खबर इक रात होके निडर मुझे जीने दो फिल्मांकन यों है कि राज कमरे से निकल बाहर आई है, अमित पीछे आता है। गाना शुरू करता है। उसकी आंख से आंसू पोंछता है। अंतरा शुरू होने से पहले आईने में खुद को देखना अपनी अलहदा खूबसूरती के प्रति उसे आश्वस्त करता है। वह पारंपरिक तौर पर गोरी-चिट्टी खूबसूरत नहीं है जैसे पूनम के बारे में वह सुनती रही है। एक हल्की मुस्कुराहट पहली बार राज के चेहरे पर अंतरे में आती है जब वह कहता है रात हसीं, ये चांद हसीं, तू सबसे हसीं मेरे दिलबर और फिर राज की झुकी पलकें उठती हैं,
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वोट दो, वैक्सीन लो!

-तो कोरोना वैक्सीन बिहार के सभी लोगों को मुफ्त में लगाएंगे?  -पार्टी का बिहार चुनाव के लिए घोषणापत्र तो यही कहता है।  -बाकी देशवासियों को नहीं लगाएंगे?  -हमने तो ऐसा नहीं कहा।  -मुफ्त में नहीं लगाएंगे?  -हमने ऐसा भी नहीं कहा।  -अच्छा, सबसे पहले बिहारवासियों को लगाएंगे?  -आप बड़े बदमाश हैं। बिहार बनाम भारत का मुद्दा बना रहे हैं। हम कोरोना जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति नहीं करते।  -गुस्सा न करिये। बिहार में टीका लगाने का क्रम क्या होगा?  -ये कैसा सवाल है?  -सबसे पहले उन्हें लगेगा जिन्होंने बीजेपी को वोट दिया?  -यह शरारतपूर्ण सवाल है। “हैव यू स्टॉप्ड बीटिंग युअर वाईफ?“ टाइप। मैं इसका जवाब नहीं देने वाला। -फिर जेडीयू के वोटर। उसके बाद एलजेपी के?  -व्हाट नॉनसेंस? सरकार सभी के लिए होती है, सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के वोटरों के लिए नहीं। जैसे हमारे पीएम सभी १२५ करोड़ देशवासियों के पीएम हैं, केवल ६०० करोड़ मतदाताओं के नहीं।  -बिलकुल। इसीलिए मैं पूछना चाहता था कि उन बिहार वासियों का क्या होगा जो आपको वोट नहीं देंगे? जो आपके सहयोगी दल को वोट नहीं देंगे? या जो वोट देंगे ही नहीं? -स

“हम पब्लिक ओपीनियन के खिलाफ नहीं जा सकते!“

  "हम पब्लिक ओपीनियन के खिलाफ नहीं जा सकते। अखबार का सर्कुलेशन गिरकर जो अब है उसका 25 फीसदी  हो जाएगा और आर्थिक नुकसान हम सह नहीं पाएंगे।" डॉक्टर अशोक गुप्ता के लेख को छापने से मना करते हुए कहता है 'जनवार्ता' का संपादक। सामने डॉक्टर भी है और अखबार का मुद्रक प्रकाशक भी और स्थानीय नगरपालिका का अध्यक्ष भी, जो डॉक्टर का छोटा भाई है पर लेख छापे जाने के खिलाफ है क्योंकि उससे चांदीपुर कस्बे की बदनामी होगी। मामला यह है कि डॉक्टर ने कस्बे के प्रमुख आकर्षण यानी प्रसिद्ध मंदिर के चरणामृत में बैक्टीरिया पाये जाने की पुष्टि की है और अगर यह बात तुरंत जनता की जानकारी में नहीं लाई गई और प्रशासन ने मंदिर को जलापूर्ति वाली पाइपलाइन ठीक नहीं की तो प्रदूषित जल से लोगों में फैल रही पीलिया की बीमारी महामारी का रूप ले सकती है। लेकिन मंदिर निर्माण करने वाले, जो सेठ भी हैं और प्रभावशाली हैं, यह नहीं मानते। उनका मानना है कि चरणामृत दूषित हो ही नहीं सकता क्योंकि उसमें गंगाजल और तुलसी के पत्ते मिले हैं। यह सब लोग मिलकर 'नास्तिक' डॉक्टर पर लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहु

आपका मीडिया ट्रायल किसीकी प्रतिष्ठा, करियर, जिंदगी तबाह कर देता है!

  सबसे पहले स्पष्ट कर दूं कि यह पुस्तक समीक्षा नहीं है। सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद रिया चक्रवर्ती के चल रहे मीडिया ट्रायल के मौजूदा समय में जिग्ना वोरा की पिछले साल नवंबर में आई किताब  'बिहाईंड बार्स इन भायखला: माय डेज़ इन प्रिज़न' एक पत्रकार के अपनी बिरादरी के हाथों मीडिया ट्रायल झेलने की आपबीती है । वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जे. डे) की हत्या के आरोप में 2011 में गिरफ्तार हुईं और 2018 में बरी हुईं जिग्ना ने कुछ महीने जेल में बताये थे और यह पुस्तक उन महीनों, मुकदमे, करियर और ज़िंदगी के बारे में है। इसका एक पहलू मीडिया ट्रायल है, जिसने उन्हें इसलिए भी ज़्यादा आहत किया कि वह खुद एक पत्रकार थीं। फ्री प्रेस जर्नल, मुंबई मिरर, मिड-डे और एशियन एज जैसे अखबारों में काम कर चुकी थीं। गिरफ्तार होने और अदालत के पुलिस कस्टडी में भेजे जाने के बाद जिग्ना लिखती हैं, “मीडिया के व्यवहार ने मुझे सबसे ज़्यादा ठेस पहुंचाई, शायद मेरे कर्मों ने ही सुनिश्चित किया था कि मैंने दूसरों के साथ जो व्यवहार किया था, मेरे साथ किया जा रहा था। मैंने यह भी महसूस किया कि मीडिया इतना बेरहम था कि प्राइम टा

तुम कब जाओगे, कोरोना?

  कोरोना, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? जब तुम आये थे, हमने तुम्हारा स्वागत किया था। तुम्हारे लिए देश के द्वार बोले तो अपने एयरपोर्ट खोल रखे थे। यह सोचा था कि कुछ दिन बिताकर चले जाओगे। तुम्हारे स्वागत में हमने ताली भी बजवाई, थाली भी पर तुम पर कोई असर नहीं हुआ, कठोर। फिर हमने दिये और मोबाइल टॉर्च जलवाकर दिवाली भी मनवाई। मंशा थी कि इस देश का सबसे बड़ा त्यौहार देखने के बाद तुम खुशी-खुशी चले जाओगे, पर तुम बड़े ढीठ निकले। गये नहीं। शायद तुम हमारे कुछ भक्त मंत्रियों के 'गो कोरोना गो' मंत्रजापा से नाराज़ हो गये और यहीं रहने का फैसला कर लिया। हमने लॉकडाऊन कर एक लक्ष्मण रेखा खींची और 130 करोड़ लोगों को घरों में बंद कर दिया। और तुम्हें 21 दिन का अल्टीमेटम दिया। महाभारत के युद्ध से तीन दिन ज़्यादा ही दिये। पर तुम नहीं गये। गौमूत्र से लेकर कोरोनिल की धमकियां दीं। तुम आईटी सेल से निकली फेक न्यूज़ की तरह फैलते रहे। मीडिया को साथ में लेकर हमने तुम्हें इग्नोर करना शुरू कर दिया। प्राइम टाइम डिबेट से तुम्हें गायब करवा दिया और बॉलीवुड, राफेल, पड़ोसी देश को मोबाइल एप्प छोड़, टीवीतोड़ जवाब आदि पर चर्चा

रुमाल जितना बयान, धोती जितना स्पष्टीकरण

-तो कोई हमारी सीमा में नहीं घुसा, न किसी चौकी पर कब्जा किया? -पीएमजी ने तो ऐसा ही बोला था लेकिन उनका ये मतलब नहीं था। -बोले तो? -पीएमओजी ने स्पष्टीकरण दिया है। आप पढ़ लीजिये। -रुमाल जितना छोटा बयान था, धोती जितना बड़ा स्पष्टीकरण। ऊपर से निकल गया। -इसका मतलब खोट आपकी समझ में है, इसमें पीएमजी और पीएमओजी का क्या कसूर? -ओके ये डीएमजी ने और ईएएमजी ने क्या कहा था? -अजी, एक बार सुप्रीम कोर्ट ने कुछ बोल दिया तो सेशन्स कोर्ट और हाई कोर्ट के ऑब्ज़रवेशंस को कौन पूछता है? -बोले तो? -बोले तो पीएमजी और पीएमओजी के बयान, स्पष्टीकरण के बाद डीएमजी और ईएएमजी के बयानों पर क्यों बात करें? -ओके। दुश्मन देश के कितने जवानों को मारा हमने? -देखिये जी, हमने आधिकारिक रूप से तो कोई बयान जारी नहीं किया, पर आपकी बिरादरी के ही कुछ सदस्यों ने 43 का आंकड़ा दिया था। एक चैनल ने तो दुश्मन देश के मारे गये जवानों के नाम भी दिये थे। -तो क्या आप उसकी पुष्टि करते हैं? -हम न तो उसकी पुष्टि करेंगे न खंडन। -वह क्यों भला? -हम मनोबल नहीं गिराना चाहते। -दुश्मन देश की सेना का? -नहीं, मीडिया क

फ्रॉम द मेकर्स ऑफ ब्लॉकबस्टर फ्रेंचाईजी ‘लॉकडाऊन‘ कम्स ‘जीना-मरना कोरोना संग‘

-कोरोना वायरस से बच गये पत्रकारों का इस वर्चुअल प्रेस कांफ्रेंस में स्वागत करते हुए बता दूं कि हमारी लॉकडाऊन फ्रेंचाइजी सफल रही है, क्या कहा? प्रमाण? अजी, आपका जीवित होना और इस पीसी में हिस्सा लेना ही इसका प्रमाण है, अब हम अनलॉक फ्रेंचाइजी ला रहे हैं। आपको जो पूछना है, पूछिए: -लॉकडाऊन शुरू करने से पहले कितने मामले थे? -एक्ज़ेक्ट फिगर तो मुझे याद नहीं, पर दो सौ से तीन सौ के बीच होंगे। -आज कितने हैं? -एक्ज़ेक्ट फिगर मुझे देखना पड़ेगा पर यही कोई दो लाख होंगे। मैं जानता हूं, आप बड़े बदमाश हैं। लॉकडाऊन को फ्लॉप साबित करना चाहते हैं पर याद रखिये, हम लॉकडाऊन नहीं लाते न, तो यह फिगर बीस लाख या उससे भी ज्यादा होता। -बीस लाख का अनुमान महामारी विशेषज्ञों से आया होगा? -नहीं, हमारे खेल मंत्रालय के कुछ आंकड़ा विशेषज्ञों ने दिया। -कोरोना को लेकर अपनी स्ट्रेटेजी के बारे में बताएंगे। -ज़रूर। देखिए कोरोना का पहला लेटर ‘सी‘ है तो हमने 'सी' को पकड़ लिया और कोरोना को कन्फ्यूज करने की रणनीति बनाई। मजे की बात ये रही कि हम सफल भी हुए। -कैसे? -हमने 14 घंटे का जनता कर्फ्यू