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जम्मू-कश्मीर प्रशासन-मीडिया संवाद जय-मौसी इश्टाईल

वैसे तो मैं उसूलन बासी खबर नहीं देता पर आगे की पंक्तियाँ पढ़कर आप समझ जायेंगे कि वजह जेन्युइन है। आठ-दस दिन पहले की बात है। जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन की एक 'ऑफ द रिकॉर्ड' और गुप्त प्रेस कांफ्रेंस हुई। पता है, आप कहेंगे कि प्रेस कांफ्रेंस 'ऑफ द रिकॉर्ड' और गुप्त कैसे हो सकती है? हुआ यूं कि प्रेस कांफ्रेंस शुरू होने से पहले प्रशासन ने कह दिया कि ब्रीफिंग के बाद सभी सवालों के जवाब दिए जायेंगे पर मीडिया को वायदा करना होगा कि वह प्रशासन की बातों से सहमत हैं तो प्रेस कांफ्रेंस की खबर कहीं नहीं छपेगी। मीडिया भूल जाएगा कि कोई प्रेस कांफ्रेंस हुई थी, हां चूँकि विषय प्रदेश में नार्मल्सी के बारे में था इसलिए मीडिया देशहित में 'उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार', 'गोपनीय एवं विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार', 'नाम न छापने की शर्त पर वरिष्ठ अधिकारी ने बताया' जोड़कर खबर दे सकता है। संवाद कुछ-कुछ 'शोले' के जय और बसंती की मौसी के बीच उस दृश्य की तर्ज पर हुआ जिसमें जय मौसी को बसंती की शादी अपने दोस्त वीरू से करने के लिए राज़ी करने की कोशिश कर रहा है। और आखिरकार मौ...

बिग ब्रेकिंग: एक और बैंक में हजारों करोड़ की डकैती!*

विशेष संवाददाता मुंबई, 01 अप्रैल : एक और बैंक में दिन-दहाड़े डकैती का सनसनीखेज़ मामला सामने आया है। पुलिस के अनुसार डकैती आज रिपोर्ट की गयी। नहीं यह वैसी डकैती नहीं थी जिसमें कुछ नकाबपोश डकैत बैंक में आते हैं और गन दिखाकर कैशियर से कैश लूट ले जाते हैं। बैंक के उच्चाधिकारियों की पुलिस में शिकायत के अनुसार डकैती का पता आज चला पर डकैती को अंजाम पिछले कुछ सालों से दिया जा रहा था। पर इसमें बैंक का भी कुछ दोष नहीं माना जा सकता। दरअसल, डकैतों का 'मोडस ओपरेंडी' ही ऐसा था, कि कोई भी शरीफ बैंकर धोखा खा जाए। इस मामले में डकैतों के गिरोह सॉरी फर्म का बैंक से रिश्ता सालों पुराना था। सालों पहले कुछ डकैतों ने एक फर्म बनाकर बैंक से सौ रुपये का क़र्ज़ लिया था अपना छोटा सा कारोबार शुरू करने के लिए। वह रकम डकैतों की फर्म ने कुछ समय बाद बैंक से ही पांच सौ रुपये क़र्ज़ लेकर लौटा दी। पांच सौ का क़र्ज़ उसने कुछ समय बाद फिर बैंक से पांच हज़ार रुपये का क़र्ज़ लेकर लौटा दिया। इस तरह डकैतों ने बैंक का विश्वास जीता और क़र्ज़ लेकर नया क़र्ज़ चुकाने का सिलसिला चल पड़ा। अब अचानक पिछले कुछ समय से उसकी ईएमआई आनी बंद...

"बोले तो पकौड़े बेचने के फैसले ने मेरी ज़िन्दगी बदल डाली!"

संपादक का फरमान था, एक पकौड़े बेचने वाले का इंटरव्यू करना था। सो मैं सड़क के किनारे एक ठेले पर पहुंचा। ठेले पर बोर्ड लगा था, "राम भरोसे रेस्तरां"। अच्छी-खासी भीड़ थी इसलिए ठेले के मालिक को बात करने के लिए मनाने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी। पेश है साक्षात्कार के कुछ महत्वूर्ण अंश:  "आप कब से पकौड़े बेचते हैं?" "जी, 16 मई 2014 से।" "उससे पहले क्या करते थे?" "बेरोजगार ही था।" "फिर अचानक पकौड़े तलने का खयाल कैसे आया?" "15 मई की रात एक महापुरुष सपने में आये और उन्होंने कहा 'बालक, तेरे दुःख भरे दिन बीत गये और अच्छे दिन आ गए है। कल से तू नौकरी के लिए दर-दर भटकना बंद कर दे, तुझे नौकरी मांगनी नहीं पगले नौकरी देनी है! तू कोई अपना काम शुरू कर!" "फिर...?" "फिर मैंने असमंजस में पूछा कि सर मैं क्या करूं? उन्होंने कहा चाय-पकौड़ी का ठेला लगा ले, दिन में 200 रुपये कहीं नहीं जायेंगे। बस फिर क्या था, यह दिव्य ज्ञान मिलने के बाद मैंने अगले दिन से ही यह 'राम भरोसे रेस्तरां' का बोर्ड लगाकर यह ठेला शुरू...