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अच्छे दिनों की ट्रेन अनिश्चितकालीन देरी से चल रही है! असुविधा के लिए खेद है!

कार्टून साभार : राजेंद्र धोड़पकर,  जैसी-तैसी सत्याग्रह अच्छे दिनों की ट्रेन का इंतज़ार कर रहे सभी भारतीय कृपया ध्यान दें, अच्छे दिनों की ट्रेन अनिश्चितकालीन देरी से चल रही है और 16 मई 2014 को पहुँचने वाली ट्रेन अभी हमें मिली जानकारी के अनुसार 2019 तक तो नहीं पहुँचने वाली। यात्रियों की असुविधा के लिए हमें खेद है! इससे पहले कि आप आक्रोशित हों, हमें अपशब्दों से नवाजें या तोड़फोड़ जैसी देशद्रोही गतिविधियां शुरू करें, हम आपसे अनुरोध करना चाहेंगे कि यह देश आपकी ही संपत्ति (हमें तो केवल इसे मैनेज करने का ठेका मिला हुआ है) है कृपया इसे नुकसान न पहुंचाएं अन्यथा हमें कानून और व्यवस्था बनाये रखने के लिए आप पर लाठी और गोली चलानी पड़ सकती है। इस वैधानिक चेतावनी के बाद वैसे हमें तो आपको कोई सफाई देने की ज़रुरत नहीं हैं पर फिर भी आपको ट्रेन के लेट होने के कारण बता देते हैं। आप सवा सौ करोड़ भारतीय हो और अच्छे दिनों की ट्रेन एक। अब वैसे भी इसमें सब एक साथ सवार नहीं हो सकते। इसलिए ट्रेन को अभी यार्ड से निकाला ही नहीं गया है। इसमें डिब्बे जोड़े जाने का काम चल रहा है ताकि सभी भारतीय इसमें सवार...

धारावाहिकों ने साहित्य को जन जन तक पहुंचाने का काम किया है

  इस सत्र के अध्यक्ष श्री कुंदन शाह जी , वक्ता श्री विष्णु खरे जी, श्री राम गोविंद जी , श्री अनंद देसाई जी और डाक्टर प्रज्ञा शुक्ल जी । मुझे विषय दिया गया है साहित्य की लोकप्रियता में धारावाहिकों की भूमिका। मैं इस विषय पर अपना नज़रिया पेश करने की कोशिश करूंगा।     मेरा यह  मानना है कि साहित्य की लोकप्रियता में धारावाहिकों की बड़ी भूमिका रही है। धारावाहिकों ने साहित्य को जन जन तक पहुंचाने का काम किया है। ऐसे लोग जिनकी भाषा की समस्या या किताबों की अनुपलब्धता या किसी अन्य कारण से साहित्य तक पहुंच नहीं हो पाती, उन तक साहित्य को पहुंचाने का काम धारावाहिकों ने किया है। श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं पर बने कुछ धारावाहिकों का जिक्र करते हुए मैं अपनी बात रखना चाहता हूं.   1.भारत एक खोज- पंडित जवाहरलाल नेहरू की किताब .. डिस्कवरी आफ इंडिया पर आधारित ये धारावाहिक जानेमाने निर्देशक श्याम बेनेगल ने बनाया था। वर्ष 1988 में इसका प्रसारण दूरदर्शन पर हुआ था। इसमें नेहरू की भूमिका रोशन सेठ ने निभाई थी । ओम पुरी और टाम अल्टर जैसे नामी कलाकारों ने इसमें अभिनय किया था। भार...

उप-कुलपति महोदय, टैंक देशभक्ति नहीं विध्वंस का स्मारक है!

जेएनयू के उप-कुलपति श्री एम. जगदीश कुमार की मांग सुनने के बाद से मन में एक सवाल उठ रहा था कि छात्रों को सेना के युद्धक टैंक अधिक प्रेरणा दे सकते हैं या हमारे महापुरुष और उनके रचे ग्रंथ ? उप-कुलपति यह भूल गए कि वह जेएनयू के कुलगुरु भी हैं और भारतीय वांङमय में कुलगुरु को छात्रों के लिए ब्रह्मा , विष्णु , महेश्वर और साक्षात्‌ परब्रह्म ही बताया गया है। हालांकि इस सवाल का जवाब कुछ दिन बाद ही मिल गया जब उनकी मांग का समर्थन करते हुए भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने लोकसभा में शून्यकाल के दौरान ज़ोर देकर कहा कि जेएनयू के छात्रों को राष्ट्रभक्ति की शपथ लेनी ही चाहिए। माना कि युद्धक टैंकों से कई शांतिपूर्ण काम भी लिए जा सकते हैं। मसलन , हमने ऐसी कई तस्वीरें देखी हैं जिनमें टैंकों पर बिठाकर लोगों को दुर्गम रास्ते पार कराए गए , मुस्कुराती हुई महिलाओं और बच्चों को टैंक पर सैर करवा कर उन्हें रोमांच से भर दिया गया। लेकिन ये अपवाद हैं। दुनिया भर में युद्धक टैंक भय का संचार करने और दमन का प्रतीक ही रहा है। टैंकों से इलाके फतह किए जाते हैं ; विद्रोह कुचले जाते हैं। दुश्मन की जीती हुई ज़मीन पर इन...

बीजेपी हरियाणा अध्यक्ष के बेटे की करतूत बयान करती पीडिता की फेसबुक पोस्ट

चंडीगढ़ की सड़क पर मैं कल रात किडनैप होने से बाल-बाल बची! इतना कहने के बाद सबसे पहले मैं चंडीगढ़ पुलिस की बेमिसाल दक्षता और बेहद परेशानी भरे हालात में किये मेरे फ़ोन पर तुरंत कार्रवाई करने के लिए उनका शुक्रिया अदा करना चाहूंगी। उन्होंने लगभग व्यवस्था में मेरा विश्वास रिस्टोर कर दिया । मैं सेक्टर-8 मार्किट से लगभग रात के 12.15 बजे ड्राइव कर रही था और एक पेट्रोल पंप के पास सड़क पार कर सेक्टर-7 में क्रॉस किया था। मैं एक मित्र के साथ फ़ोन पर भी थी और लगभग एक मिनट बाद मैंने महसूस किया कि एक कार मेरा पीछा कर रही थी। यह एक सफ़ेद एसयूवी थी और मैंने जैसे उसे देखा, कार करीब आई और मेर्री कार के साथ-साथ चलने लगी। अब मैं सेक्टर-7 में थी, और सेक्टर-26 में सैंट जॉन स्कूल के बाद के सिग्नल की तरफ बढ़ रही थी। एसयूवी में दो लड़के थे और दोनों आधी रात को एक अकेली लड़की को तंग करने का मज़ा लेते दिख रहे थे। यह देखते हुए कि उनकी कार कितनी लहरा रही थी, मुझे डराने के लिए काफी था कि कार मेरी कार से टकरा सकती थी। अब तक मैं पूरी तरह सतर्क हो चुकी थी और थोड़ी घबराई हुई भी थी इसलिए मैंने सैंट जॉन स्कूल ट्...

ये विचार लेखक के अपने नहीं हैं!

कभी-कभी लगता है कि हम 'पल्ला झाड़ू' युग में जी रहे हैं, जहाँ सब समस्या या विवाद तो 'क्रियेट' करना जानते हैं, करते भी हैं पर फंसने पर उसे 'ओन' करना नहीं जानते। कोई भी, कोई भी यानी कोई भी अपने कहे-किये की जिम्मेवारी नहीं लेना चाहता। ज़रा सा विवाद हुआ कि वह उस विवादस्पद बयान/कार्य से पल्ला झाड़ लेता है यह कहकर कि ऐसा उसने कहा ही नहीं, उसकी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया, उसका यह मतलब नहीं था या कि यह उसके निजी विचार थे/नहीं थे। आखरी बहाना इस पर निर्भर करता है कि उसकी जान किस सूरत में बच सकती है। बरसों पहले टीवी पर एक धारावाहिक में 'डिस्क्लेमर' देखा था, यह धारावाहिक ऐसा कोई दावा नहीं करता कि यह इतिहास दर्शा रहा है, धारावाहिक के सभी पात्र काल्पनिक हैं और इसका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन करना है वगैरह वगैरह।।। बाद में तो डिस्क्लेमर फैशन ही बन गया। फलां धारावाहिक का उद्देश्य बाल विवाह को बढ़ावा देना नहीं है, फलां धारावाहिक का उद्देश्य नारियों पर अत्याचार को बढ़ावा देना नहीं है, फलां धारावाहिक का उद्देश्य बच्चों के शोषण को बढ़ावा देना नहीं है, फलां धारावाहिक का उद...

"Pahinjo Hikdo Hi Yaar AA" bags 4 awards at 2nd Sindhi Film Festival, Delhi

Sindhi movie "Pahinjo Hikdo Hi Yaar AA" (PHHYA) bagged 4 awards at 2nd Sindhi Film Festival held this week at New Delhi by Sindhi Academy, Delhi Government. According to sources related to PHHYA, the movie which created history by premiering in Dubai in 2014, got awards for Best film (popular), Best director (Ramesh Nankani), Best Actor (Jeetu Vazirani) and Best Music Director (Hitesh Udhani). Award for best music was shared by Kamlesh Vaidya and Vijay Rupani (Vardaan)    The festival held on 27th and 28th May at Sirifort Stadium, New Delhi, screened 4 movies; PHHYA, Nai Shuruaat, Vardhaan and Trapadd Teshion Tey. Nai Shuruaat, a movie based on thalasemmia, bagged awards in category of Best film (critics) and Best cinematography (Unnidivakaran D Vinod). While Vardaan, with a message to save girl child, got award for Best female actor (Komal Chandnani) also.

सब विपच्छ का दोष है!

पिछले तीन सालों में हमारे देश में एक नया रहस्योद्घाटन हुआ है, वह यह कि देश की सभी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार विपक्ष है। देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा विपक्षी दल हैं। देश का अगर विकास हुआ है (और हुआ तो होगा ही), तो वह विपक्ष के कारण नहीं बल्कि विपक्ष के बावजूद हुआ है और जो नहीं हुआ तो उसका ज़िम्मेदार विपक्ष है। यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि तीन साल पहले तक की सरकारें कमज़ोर और नाकारा थीं और अब विपक्ष कमज़ोर और नाकारा है। विपक्ष कमज़ोर और नाकारा तो है ही विभिन्न विपक्षी दलों में कोई एकता भी नहीं है। अब इसके लिए आप सरकार को तो दोष नहीं न दे सकते। सरकार देश चलाये या विपक्षी एकता की चिंता करे?     चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, न जाने कितने राजनीतिक पंडित यह लिखते-बोलते नहीं थकते कि साहब हमारे देश का विपक्ष मज़बूत होता तो फलां मुद्दे पर सरकार को फाड़ देता, फलां मुद्दे पर सरकार को चीर देता। विपक्ष में दम होता तो सरकार इतनी निरंकुश न होती। सरकार की मजाल न होती कि वह कोई गलत कदम उठाती, मनमाने फैसले लेती, पर अफ़सोस हमारा विपक्ष इतना कमज़ोर, इतना नाकारा है...