Skip to main content

‘शांति मार्च‘ में ‘गोली मारो‘ के नारे लगना, गोदी मीडिया के संपादक का धर्म संकट में फंसना


धर्म संकट गहरा था। गोदी मीडिया के क्या टीवी, क्या अखबार और क्या वेबसाईट, सभीके न्यूज़रूम में उस दिन यही माहौल था। यहां पेश है एक अखबार के न्यूजरूम में संपादक के केबिन में बुलाई गई बैठक का एक्सक्लूजिव ब्यौरा।

मामले की पृष्ठभूमि संक्षेप में यूं है कि शहर में 40 से ज्यादा जानें लेने वाली हिंसा थमने के बाद सत्तारूढ़ पार्टी के समर्थन से एक शांति मार्च निकला। शांति मार्च में सत्तारूढ़ पार्टी के वह नेताजी भी शामिल थे, शामिल क्या थे, नेतृत्व ही वही कर रहे थे, जिनके नाम भड़काऊ भाषण देने और हिंसा भड़कने का कारण बनने को लेकर प्राथमिकी दर्ज होते-होते रह गई थी। खैर, शांति मार्च कवर करने के लिए जिस रिपोर्टर को भेजा गया था, वह लौटकर अपनी खबर वरिष्ठ उप संपादक को दे चुका था। एक नज़र डालने के बाद वरिष्ठ उप संपादक ने खबर मुख्य उप संपादक को दे दी। मुख्य उप संपादक ने समाचार संपादक को और समाचार संपादक ने खबर संपादक के केबिन में भिजवा दी। पांच मिनट के अंदर संपादक ने सबको केबिन में बुला लिया। संबंधित रिपोर्टर और चीफ रिपोर्टर को भी बुला लिया गया था और मीटिंग शुरू हो गई।
संपादक : यह खबर हम कैसे छाप सकते हैं? जिसका शीर्षक ही है, ‘शांति मार्च में‘ ‘गोली मारो‘ के नारे लगे।
समाचार संपादक : शीर्षक बदल दिया जायेगा, सर।
संपादक : सिर्फ शीर्षक बदलने से क्या होगा? क्या इंट्रो से ही यह बात गायब नहीं की जा सकती?
रिपोर्टर : पर सर, यह नारा तो लगा था। एक और नारा लगा था, ‘किसीको मत माफ करो, जिहादियों को साफ करो।‘ मैंने मोबाईल पर वीडियो शूट किया है जो आप देख...
संपादक : (रिपोर्टर की बात काटते और उसे डांटते हुए) मैं एनई से बात कर रहा था।
समाचार संपादक : (रिपोर्टर को प्यार से समझाते हुए) हम कोई ईवेंट कवर करने जाते हैं, वहां बहुत कुछ बोला जाता है, होता है, जरूरी नहीं हम सब लिखें या इंट्रो में ही लिखें।
संपादक : करेक्ट।
समाचार संपादक : इंट्रो बदल देंगे सर। कुछ ऐसा कर देंगे कि शहर की दिल दहलाने वाली हिंसा से व्यथित, दुखी और कुछ सहृदय नागरिकों ने अपने प्रिय, शांति के मसीहा नेता के नेतृत्व में शांति मार्च निकाला।
संपादक : ठीक। नारे लगने वाली बात हमें गोल करनी होगी। या कोई ऑफिशियल कोट मिल जाये कि नारे नहीं लगे थे।
(क्राईम रिपोर्टर को भी मीटिंग में बुलाया गया और पुलिस के किसी वरिष्ठ अधिकारी से बात करने को कहा गया। रिसोर्सफुल क्राईम रिपोर्टर बड़ी मुश्किल से एक हेड कांस्टेंबल से बात कर पाया और उसने भी नाम न छापने की शर्त पर इतना ही कहा कि शांति मार्च पीसफुल रहा। नारे लगने का खंडन उसने भी नहीं किया। रिपोर्टर का हौसला बढ़ गया।)
रिपोर्टर : देखा सर।
(इस बार संपादक रिपोर्टर को डांटे, एनई पहले ही बीच में आ गये।)
समाचार संपादक : सर, खबर लगाने के झंझट में ही क्यों पड़ें? तस्वीर लगा देते हैं कैप्शन के साथ।
(फोटोग्राफर, जो इस दौरान मीटिंग में शामिल हो चुका था, ने तुरंत तस्वीरें टेबल पर फैला दीं। एनई ने एक तस्वीर छांटी औेर संपादक को बढ़ा दी, जिसमें प्रदर्शनकारी अपेक्षाकृत गंभीर दिख रहे थे और जिसमें नेताजी भी थे।)
संपादक : यह ठीक रहेगा।
(अपनी स्टोरी किल होने से बचाने के लिए रिपोर्टर ने आखिरी कोशिश की।)
रिपोर्टर : सर, ऐसा भी तो कर सकते हैं कि फ्रंट पेज पर फोटो ली जाये, खबर अंदर दे दी जाये सिटी पेजिस में...

मुख्य उप संपादक : (मज़ाक उड़ाने के अंदाज में) डेस्क के पेट पर क्यों लात मार रहे हो? क्या अब यह भी तुम्हीं तय करोगे कि कौन खबर कहां जानी चाहिए, जानी चाहिए कि नहीं?
संपादक : (रिपोर्टर से) नहीं, सीरियसली। अगर आप मेरी कुर्सी संभालने के लिए तैयार हैं तो मैं रिजाईन दे देता हूं, आप संपादक बन जाओे।
(रिपोर्टर का चेहरा लटक गया।)
एनई : (माहौल हल्का करने के लिए) ऐसा तो न हो पाएगा पर एक दिन का गेस्ट एडीटर तो बना ही सकते हैं, आखिर मासकॉम की डिग्री लेकर आए हैं, हमारी तरह थोड़े ही सिफारिश से नौकरी हासिल की हो और बरसों दसियों जगह खटने के बाद एनई बन पाए हों।
(सब ‘होहो‘ करके हंसने लगे।) 
चीफ रिपोर्टर : (जो अब तक कुछ नहीं बोले थे पर जिनसे अपने रिपोर्टर का रुआंसा  चेहरा देखा नहीं गया) सर, कोई तो रास्ता निकालिये, नया रिपोर्टर है और बेचारे ने बहुत मेहनत करी है।
संपादक : तो रिपोर्टर की मेहनत जाया न करने के लिए हम सूली पर चढ़ जाएं?
समाचार संपादक : (संपादक को शांत करते हुए) सर, इनका यह मतलब नहीं था। तो जैसा आपने कहा, वैसे ही होगा। एक तस्वीर, कैप्शन लगा देते हैं, मामला खत्म।
संपादक : हूं। (घड़ी देखते हुए) एडीशन का टाइम निकला जा रहा है। मीटिंग भी खत्म कर देते हैं। (फिर जैसे कुछ याद आया हो) आज देखिये टेंशन में मीटिंग में आप लोगों को चाय-समोसा खिलाना भी भूल गये।
समाचार संपादक : कैंटीन में बोल देता हूं सबके टेबल पर पहुंच जायेगा, सर।

उपसंहार
मीटिंग के करीब आधे घंटे बाद संपादक को जोर का झटका बहुतै जोर से लगा जब वह यूरिनल के लिए शौचालय में गये। सामने दीवार पर लिखा था, ‘गोली मारो संपादक को‘।


(क्या कहा? सोर्स?? बच्चे की जान लेंगे क्या???

कोई नहीं जी!/महेश राजपूत 

Comments

Popular posts from this blog

प्रेमचंद का साहित्य और सिनेमा

-गुलजार हुसैन प्रेमचंद का साहित्य और सिनेमा के विषय पर सोचते हुए मुझे वर्तमान फिल्म इंडस्ट्री के साहित्यिक रुझान और इससे जुड़ी उथल-पुथल को समझने की जरूरत अधिक महसूस होती है। यह किसी से छुपा नहीं है कि पूंजीवादी ताकतों का बहुत प्रभाव हिंदी सहित अन्य भाषाओं की फिल्मों पर है।...और मेरा तो यह मानना है की प्रेमचंदकालीन सिनेमा के दौर की तुलना में यह दौर अधिक भयावह है , लेकिन इसके बावजूद साहित्यिक कृतियों पर आधारित अच्छी फिल्में अब भी बन रही हैं।  साहित्यिक कृतियों पर हिंदी भाषा में या फिर इससे इतर अन्य भारतीय भाषाओं में अच्छी फिल्में बन रही हैं , यह एक अलग विषय है लेकिन इतना तो तय है गंभीर साहित्यिक लेखन के लिए अब भी फिल्मी राहों में उतने ही कांटे बिछे हैं , जितने प्रेमचंद युग में थे। हां , स्थितियां बदली हैं और इतनी तो बदल ही गई हैं कि नई पीढ़ी अब स्थितियों को बखूबी समझने का प्रयास कर सके। प्रेमचंद जो उन दिनों देख पा रहे थे वही ' सच ' अब नई पीढ़ी खुली आंखों से देख पा रही है। तो मेरा मानना है कि साहित्यिक कृतियों या साहित्यकारों के योगदान की उपेक्षा हिंदी सिनेम...

नरक में मोहलत (कहानी)

  -प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच्ची को गोद से उतार, पत्नी के गाल थपथपाता हुआ वह दरवाजे से निकल पड़ा ऑफिस के लिए। इरादा बिल्कुल वही था जैसा उसने अनिता से कहा था। लेकिन अपने मिजाज का क्या करे। एक बार जब दिमाग भन्ना जाता है तो कुछ आगा-पीछा सोचने के काबिल कहां रहने देता है उसे।  मामला दरअसल वेतन वृद्धि का था। अखबार का मुंबई संस्करण शुरू करते हुए सीएमडी साहब ने, जो इस ग्रुप के म...

कंटीली तारों से घायल खबर : कश्मीर की सूचनाबंदी - 2

(एनडब्ल्यूएमआई-एफएससी रिपोर्ट) गिरफ्तारियां, धमकियाँ और जांच त्राल से इरफ़ान मलिक पहले पत्रकार थे जिन्हें 5 अगस्त की बंदी के बाद हिरासत में लिया गया। यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें आखिर क्यों हिरासत में लिया गया। एक और पत्रकार क़ाज़ी शिबली को अनंतनाग से बंदी से पहले ही हिरासत में लिया गया था, संभवत: सैन्य बलों की   तैनाती के बारे में ट्वीट करने के कारण। पत्रकारों से पुलिस और जांच अधिकारियों ने कुछ संवेदनशील ख़बरों को लेकर पूछताछ की है और उन पर अपने स्रोत बताने का दबाव भी डाला गया है। कुछ प्रमुख अखबारों के संपादकों को भी दबी जुबां धमकी दी गयी है कि उनसे जांच अधिकारी पूछताछ कर सकते हैं। दबाव की नीतियां अपनाने का एक और उदाहरण वरिष्ठ   अंतर्राष्ट्रीय और   प्रतिष्ठित स्वतंत्र राष्ट्रीय मीडिया के साथ काम करने वाले पत्रकारों फ़याज़ बुखारी, एजाज़ हुसैन और नज़ीर मसूदी को प्रताड़ित करने के प्रयास में मौखिक रूप से सरकार की तरफ से दिया गया घर खाली करने को कहा गया है। स्तंभकार और लेखक गोहर गिलानी को 31 अगस्त को विदेश जाने से रोकना, कश्मीरी आवाजों को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पहुँचने ...